प्रकृति और प्रगति में आपको भी विरोधाभास दिखता है: अनुपम

कहा-समय रहते हम अपने व्यवहार, नीति और राजनीति को नहीं बदलेंगे तो हम शायद बचे ही न
नई दिल्ली 5 जून (मनप्रीत सिंह खालसा):- आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जा रहा है। हम में से कई लोग फूल, पत्ती, वृक्ष, पौधे, नदी, पहाड़ की तस्वीर शेयर करके इस दिन की शुभकामनाएं दे रहे हैं। ज़्यादातर लोग प्रकृति को संरक्षित करने या धरती को बचाने की अपील करते हैं। ये अच्छी बात है!

लेकिन हमारे लिए समझना जरूरी है कि जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो दरअसल अपनी ही बात कर रहे होते हैं। मनुष्य की तो औकात ही नहीं है प्रकृति या धरती को “बचाने” की। प्रकृति के सामने इंसान हमेशा छोटा ही रहेगा, चाहे हम कितना भी वैज्ञानिक शोध कर लें या तकनीकी विकास हो जाये। क्योंकि हमने नहीं बनाया इस प्रकृति को। प्रकृति ने हमें बनाया है। पर्यावरण सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा इसलिए है क्योंकि हमें खुद को और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है। प्रकृति तो अपना ख़याल स्वयं रख लेगी। जलवायु परिवर्तन या वैश्विक तामपान का असर हमारे अस्तित्व पर पड़ेगा। इससे कोई प्रकृति “नष्ट” नहीं हो जाएगी।

अगर एक वायरस के खतरे ने पूरी दुनिया में इंसानी व्यवहार को इस कदर बदल दिया, व्यवस्थाओं और अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाल दिया। तो जलवायु परिवर्तन (climate change) का खतरा तो इससे भी कहीं बड़ा है दोस्तों। अगर समय रहते हम अपने व्यवहार, नीति और राजनीति को नहीं बदलेंगे तो हम शायद बचे ही न।

तो इसका समाधान क्या है? और क्या चुनौतियां हैं हमारे सामने?

सबसे बड़ी चुनौती है कि दूरदर्शी नेतृत्व देने वाले या फ्यूचिरिस्तिक पॉलिटिक्स करने वाले नेताओं की विश्व में घोर कमी है। दुनिया भर में राजनीतिक नेतृत्व दे रहे कई महत्वपूर्ण लोगों का तो विज्ञान और तर्क से ही छत्तीस का आंकड़ा है। हमारे प्रतिनिधि बनकर फैसले लेने वाले कई ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं जो जलवायु परिवर्तन को मानते ही नहीं और मूर्खों जैसे बयान देते हैं। जो समझदार भी हैं उनकी सोच और योजनाएं बस अगला चुनाव जीत लेने तक सीमित रहती हैं। 

अगर सही मायने में आप पर्यावरण की गंभीरता को समझते हैं और इसके प्रति संवेदनशील हैं तो अपने मन में ही सही, लेकिन कुछ तय कर लीजिए आज। ये तय करिए कि नेताओं से पर्यावरण को लेकर आप सवाल करेंगे। चाहे किसी भी पार्टी का हो, किसी भी स्तर के चुनाव में हिस्सा ले रहा हो। मुखिया सरपंच और स्थानीय प्रतिनिधियों से पंचायत में जलाशयों को लेकर योजना पूछिये। जहाँ ज़रूरत हो वहाँ पूछिये कि वर्षा जल संरक्षण पर क्या योजना है उनकी। सांसदों और खुद को बड़ा नेता बताने वालों से सवाल करिए कि पर्यावरण को लेकर कितनी समझ और संवेदनशीलता है उनमें। मीडिया और पत्रकारों से भी पूछिए कि आँधी, तूफान, बाढ़ और भूकंप की रिपोर्टिंग के अलावा कब उन्होंने कोई प्रोएक्टिव काम किया है पर्यावरण पर। ये जो केंद्र सरकार तरह तरह की योजनाओं के नाम पर या ease of doing business के नाम पर कानून में खतरनाक संशोधन करते हैं उसपर कितनी नज़र है आपकी.?

और सबसे ज़रूरी है हमारा और आपका ये समझना कि “विकास” कहते किसको हैं। क्योंकि बहुत कुछ जो पर्यावरण के साथ सरकारें करती हैं वो विकास के नाम पर ही होता है। तो ये समझ लीजिए कि विकास और पर्यावरण बिल्कुल भी विरोधाभाषी नहीं हैं। ये जो माहौल बनाया जाता है जिसका शिकार आप भी होते हैं। जैसे मुम्बई के ‘आरे फॉरेस्ट’ काटे जाने का जो विरोध करे उसको विकास विरोधी कह दो। ‘जल जंगल ज़मीन’ की बात करने वाले को तरह तरह के नाम से पुकारो।

सबसे ज़रूरी आपकी और हमारी समझ है। ये समझिए कि प्रकृति के बिना प्रगति हो ही नहीं सकती। जिस विकास की परिभाषा में पर्यावरण की परवाह नहीं है, वो फ़र्ज़ी परिभाषा है, खोखला विकास है।

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