बोन मैरो ट्रांसप्लांट सर्जरी से मरीज को मिला नया जीवन

बोन मैरो ट्रांसप्लांट सर्जरी से मरीज को मिला नया जीवन

 

एप्लास्टिक एनीमिया के मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट सर्जरी से मिला नया जीवन

 

भठिंडा: भठिंडा के रहने वाले 46 वर्षीय राजेश कुमार ;मरीजद्ध को एप्लास्टिक एनीमिया की बीमारी थी। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें व्यक्ति के शरीर में नई ब्लड सेल्स बनना बंद हो जाती हैंए जिससे मरीज की जान जाने का खतरा बनता है। गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में मरीज का सफलतापूर्वक इलाज किया गया।

मरीज 2017 से इस बीमारी से परेशान था और दिन पर दिन उसकी हालत गंभीर होती जा रही थी। हरियाणा और जयपुर के कई अस्पतालों में इलाज कराने के बाद भी जब फायदा नहीं मिला तो उन्हें गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रेफर कर दिया गया। जहां फोर्टिस हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी व बोन मैरो ट्रांसप्लांट निदेशकए डॉक्टर राहुल भार्गव ने अपनी टीम के साथ मिलकर बोन मैरो ट्रांसप्लांट सर्जरी कर मरीज को एक निया जीवन दिया।
एप्लास्टिक एनीमिया एक ऐसी बीमारी हैए जिसमें मरीज को हर रोज नए खून की आवश्यकता होती है। इसमें मरीज में संक्रमण व अनियंत्रित ब्लीडिंग के साथ उसे बहुत ज्यादा थकान महसूस होती है। यह एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी हैए जो किसी भी उम्र में विकसित हो सकती है। ये बीमारी अचानक ही विकसित होती है और धीरे.धीरे गंभीर होती जाती है। इसका इलाज मेडिकेशनए ब्लड ट्रांसफ्युजन ;नए खून का प्रवेशद्ध और बोन मैरो ट्रांसप्लांट की मदद से संभव है।
गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के ऑन्कोलॉजी व बोन मैरो ट्रांसप्लांट निदेशकए डॉक्टर राहुल भार्गव ने बताया किए श्मरीज को 2 साल पहले बहुत ही गंभीर स्थिति में भर्ती किया गया था। एफएमआरआई लाने से पहले उसे रोज नया खून दिया जाता था। 5 महीनों के वक्त में उसे 22 बोतलों की प्लेटलेट्स दी जा चुकी थीं। एप्लास्टिक एनीमिया में मरीज को हर दिन नए खून की जरूरत होती है क्योंकि उसका शरीर नई ब्लड सेल्स बनाना बंद कर देता है। इस बीमारी का इलाज केवल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के साथ ही संभव है। इस प्रक्रिया में मरीज के ब्लड सैंपल एचएलए टाइपिंग के लिए भेजे गए। इसमें मरीज के टिशूज को अन्य व्यक्ति के टिशूज के साथ मैच किया जाता है। सौभाग्य से मरीज के टिशूज उनके भाई के टिशूज के साथ पूरी तरह मैच कर रहे थे।
डॉक्टर राहुल भार्गव ने आगे बताया किए श्लोगों में इस बात की जागरुकता बढ़ाना बहुत जरूरी है कि स्टेम सेल डोनेशन एक सेफ प्रक्रिया हैए जिसमें डोनर से 300 एमएल खून की जरूरत होती है। इस केस की बात करें तोए ट्रांसप्लांट के डेढ़ महीनों के बाद मरीज को डायरिया की समस्या हो गईए जो मरीज के शरीर में नए सेल्स के कारण विकसित हुई थी। मरीज के शरीर में जब किसी अन्य व्यक्ति की सेल्स ट्रांसफ्यूज की जाती हैं तो ये सेल्स मरीज के शरीर पर अटैक करती हैंए जिसके कारण उसकी जान जाने का खतरा बनता है। इम्यून सप्रेशन की मदद से मरीज की समस्या का सफल इलाज किया गया।
मरीज श्री राजेश कुमार ने बताया किए श्मुझे यह बीमारी 2 साल पहले हुई थी। मुझे अपने फैसले पर खुशी हैए जिसके कारण ही आज मैं फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो पाया हूं। मईए 2017 से मेरी तबियत बिगड़ने लगी और फिर हर सुबह मेरे मसूढ़ों से खून निकलने लगा। मुझे लगा कि यह दातों से संबंधित कोई समस्या हैए इसलिए मैंने डेन्टिस्ट से संपर्क किया। इलाज के 10 दिनों बाद भी खून निकलना बंद नहीं हुआ। डॉक्टर की सलाह पर मैंने सीबीसी कराईए जिसमें एप्लास्टिक एनीमिया की पहचान हुई। मेरे मल के साथ भी खून आने लगा। जब मैं फोर्टिस आया तो मुझमें न के बराबर उम्मीद बची थी। वहां हर 7वें दिन मुझे नया खून दिया जाता था। मैं समय के साथ कमजोर होता जा रहा थाए फिर डॉक्टर भार्गव ने मुजे दिलासा दी कि बीएमटी के बाद मैं पूरी तरह से ठीक हो जाऊंगा। मेरे बड़े भाई की सेल्स मुझसे मैच कर गईंए जिससे मेरी जान बच सकी।

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